Baghdad’s Sufi saint who traveled to India

इस दुनिया में जिसने किसी भी तरह का आध्यात्मिक पागलपन दिखाया, उसे हमेशा सताया गया है। मंसूर अल-हलाज भी ऐसे ही सूफी संत थे। जानिए उनकी शख्सियत के कुछ पहलुओं कोः

मंसूर अल-हलाज सूफीवाद के सबसे विवादास्पद व्यक्तियों में से एक थे। उन्होंने दावा किया था ‘मैं ही सत्य हूं’ जिसे धर्म विरोधी माना गया और इस कारण उन्हें पचपन साल की उम्र में बड़ी बेरहमी के साथ मौत की सजा दे दी गई। हालांकि सच्चे ईश्वर-प्रेमी समझते थे कि उनके यह कहने का क्या मतलब है, और वो उनका बड़ा आदर करते थे, और आज भी करते हैं।
बात उन दिनों की है जब मंसूर बगदाद में थे। अपने सूफी गुरु जुनैद से उन्होंने कई विवादास्पद सवाल किए, लेकिन जवाब देने के बजाय जुनैद ने कहा, ‘एक समय ऐसा आएगा, जब लकड़ी के एक टुकड़े पर तुम लाल धब्बा लगाओगे।’

उन्होंने इस बात से इशारा कर दिया था कि एक दिन मंसूर को फांसी के तख्ते पर लटका दिया जाएगा। इस पर मंसूर ने जवाब दिया, ‘जब ऐसा होगा, तो आपको अपना सूफी चोला उतार कर एक धार्मिक विद्वान का चोला धारण करना होगा।’ यह भविष्यवाणी तब सच हुई जब मंसूर की मौत का हुक्मनामा तैयार किया गया और जुनैद से उस पर दस्तखत करने को कहा गया। हालांकि जुनैद दस्तखत नहीं करना चाहते थे, लेकिन बगदाद के खलीफा इस बात पर अड़ गए कि जुनैद को दस्तखत करने ही होंगे। खैर, जुनैद ने अपना सूफी चोला उतार दिया और एक धार्मिक विद्वान की तरह पगड़ी और अंगरखा पहन कर इस्लामिक अकादमी पहुंचे। वहां उन्होंने यह कहते हुए मौत के फरमान पर दस्तखत किए कि ’हम मंसूर हलाज के बारे में फैसला सिर्फ बाहरी सत्य के आधर पर कर रहे हैं। जहां तक भीतरी सत्य की बात है, तो इसे सिर्फ खुदा ही जानता है।

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जुनैद से मिलने के बाद अगले पांच साल तक उन्होंने एक ऊच्च आध्यात्मिक अवस्था में मध्य एशिया और ईरान के कई इलाकों की यात्रा की। विद्वानों और आम लोगों, दोनों ने ही उनकी शिक्षाओं और प्रवचन को हाथों हाथ लिया और उनकी भरपूर प्रशंसा की। अपनी तीखी परख के कारण वे ’हलाज’ यानी रहस्यों के उस्ताद के रूप में जाने गए। वे बसरा से मक्का तीर्थयात्रा पर गए, लेकिन यहां उन पर जादूगर का ठप्पा लगा दिया गया। इसके बाद वह भारत और चीन की यात्रा पर निकल पड़े, जहां उन्हें एक प्रबुद्ध गुरू के रूप में पहचान मिली।

उन्होंने मक्का की अपनी दूसरी हज यात्रा की और वहां दो साल तक रहे। लेकिन उनके आध्यात्मिक सीख बांटने के तरीके में एक बड़ा बदलाव आ चुका था। उनकी शिक्षाएं अब बहुत गूढ़ हो चुकी थीं और ‘मैं ही सत्य हूं’ का दावा करके वे लोगों को एक ऐसे ’सत्य’ की ओर आकर्षित करने लगे जो लोग शायद समझ नहीं सके। उनके द्वारा किए गए चमत्कारों के बारे में कई किस्से फैलने लगे। लोग उनके बारे में तरह-तरह की राय रखने लगे। कहा जाता है कि ‘मैं ही सत्य हूं’ के धर्म विरोधी दावे की वजह से उन्हें करीब पचास इस्लामिक शहरों से खदेड़ दिया गया था।

मक्का की दूसरी हज यात्रा पर करीब चार हजार लोग हलाज के साथ गए थे। पूरे एक साल तक वह काबा के सामने नंगे पैर और नंगे सिर ऐसे ही खड़े रहे। रोज एक आदमी उनके सामने कुछ रोटियां और एक जग पानी रख जाता, लेकिन कभी-कभार ही ऐसा हुआ कि हलाज ने उन रोटियों और पानी को हाथ लगाया। नतीजा हुआ कि उनका शरीर हड्डियों का ढांचा भर रह गया।

बगदाद वापस आने पर कट्टरपंथी धार्मिक लोगों ने उन पर धर्मविरोधी होने का आरोप लगाया और उन्हें एक साल के लिए जेल में डाल दिया। जेल में शुरु के छह महीनों तक लोग लगातार उनसे सलाह लेने आते रहे, लेकिन जब खलीफा को इस बात का पता चला तो उसने हुक्म दिया कि हलाज से कोई नहीं मिल सकता। जिस जेल में हलाज को बंद किया गया था, उसमें तीन सौ कैदी थे।

एक रात हलाज ने उन कैदियों से पूछा कि क्या आप लोग जेल से आजाद होना चाहते हैं? कैदियों के ‘हां’ कहने पर हलाज ने अपनी उंगली से एक रहस्यपूर्ण इशारा किया। अचानक सभी हथकड़ियां और ताले टूट गए और जेल के दरवाजे खुल गए। सारे कैदी जेल से भागने लगे लेकिन हलाज नहीं भागे। भाग रहे कैदियों ने हलाज से जब उनके नहीं भागने का कारण पूछा तो हलाज ने जवाब दिया, ‘मेरा ’मालिक’ के साथ कुछ गुप्त मामला चल रहा है, जिसका खुलासा सिर्फ फांसी के तख्ते पर ही हो सकता है। मैं अपने मालिक – खुदा का कैदी हूं।’
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इस घटना के बाद खलीफा ने उन्हें मौत की सजा सुना दी। कहा जाता है कि बगदाद में एक लाख लोग उनकी फांसी को देखने के लिए इकठ्ठे हुए। पांच सौ कोड़े मारने के बाद उनके हाथ-पैरों को काट दिया गया, उनकी आंखें निकाल ली गईं और जीभ को भी काट दिया गया। उनके क्षत-विक्षत शरीर को ऐसे ही तड़पने के लिए छोड़ दिया गया। कुछ समय में ही उनकी मौत हो गई। जब जल्लाद ने उनका सिर काटा तो उनके धड़ से खून की धार फूट पड़ी और तेज आवाज आई, ‘मैं सत्य हूं।‘ अचानक उनके शरीर से कटा एक-एक अंग चीखने लगा ‘मैं ही सत्य हूं।’ इसके बाद उन पर उंगली उठाने वालों को अहसास होने लगा कि उन्होंने खुदा के एक लाडले की हत्या कर दी है।

मंसूर भारत में धर्म ग्रंथों और उन चीजों को सिखाने आए थे, जो वे जानते थे। वे बस इन्हीं सब चीजों के बारे में बात करते थे। लेकिन जब वह गुजरात और पंजाब पहुंचे तो उनकी मुलाकात कुछ ऐसे सच्चे आध्यात्मिक दीवानों से हुई, जो परमानंद की एक अलग ही अवस्था में थे।
जब वह वापस लौटे तो बस एक लंगोटी पहने हुए थे। जिस समाज से वे आए थे, उसमें अगर कोई आदमी केवल लंगोटी पहने यूं ही सड़कों पर घूमता दिखे, तो उसे घोर पागल समझा जाता था। अपने भीतर परम आनंद का अनुभव कर रहे हलाज ने कहना शुरू कर दिया, ‘मैं कुछ नहीं हूं, मैं कोई नहीं हूं।’ इसके बाद वह पागलों की तरह सड़कों पर नाचने-गाने लगे।

जब आप परम आनंद की अवस्था में होते हैं तो आपके व्यक्तित्व का ढांचा जो सख्त होता है, वह ढीला पड़ जाता है। मानो भट्टी में पूरी तरह पका हुआ मिट्टी का बरतन फिर से कच्ची मिट्टी का बरतन बन जाए। वह फिर से नरम और लचीला हो जाता है।

आप उसे जैसा चाहें, फिर से एक नया रूप, एक नया आकार दे सकते हैं। कभी आपने महसूस किया है कि जब लोग मस्ती में होते हैं तो वे बहुत लचीले हो जाते हैं और जब नाखुश होते हैं तो वही लोग बहुत सख्त हो जाते हैं, बिल्कुल लकड़ी की तरह।

जब लोगों ने देखा कि मंसूर पर पागलपन सवार हो गया है तो उन्होंने उनसे दूरी बनानी शुरू कर दी, पर उन्होंने उनका ज्यादा विरोध नहीं किया। लेकिन जैसे ही उन्होंने कहा कि ‘मैं खुदा हूं’ तो उन पर तमाम तरह के आरोप लगाए जाने लगे। वह मक्का जा पहुंचे। वहां हर कोई काबा के चक्कर लगा रहा था। उन्होंने सोचा कि यहां इतनी भीड़ क्यों है? हर कोई यहीं क्यों चक्कर लगा रहा है? उन्होंने वहां से हट कर पास की एक गली में एक और पत्थर की स्थापना कर दी। संभवतः उन्होने उस पत्थर में प्राण-प्रतिष्ठा कर दी थी। उन्होंने देखा कि उन दोनों जगहों की ऊर्जा एक जैसी थी। फिर उन्होंने लोगों से कहा, ‘काबा में बहुत ज्यादा भीड़ है। सबको उसी एक जगह पर घूमने की कोई जरूरत नहीं है। कुछ लोग इस पत्थर के चारों ओर भी घूम सकते हैं।’
बस इतना कहना काफी था। इसके लिए मंसूर को भयंकर सजा दी गई। उनकी खाल उधेड़ दी गई, उन्हें कमर तक जमीन में गाड़ दिया गया और उस जगह के खलीफा ने हुक्म दिया कि जो कोई भी उस गली से गुजरेगा, उसे उन्हें पत्थर मारना ही होगा। बिना उन्हें पत्थर मारे आप उस गली से नहीं गुजर सकते।
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जब उनका एक करीबी दोस्त उधर से गुजरा, तो उसे भी उन पर कुछ फेंकना था। उसकी जब पत्थर फेंकने की हिम्मत नहीं हुई तो उसने उनकी ओर एक फूल फेंक दिया। तभी मंसूर के मुंह से एक कविता फूट पड़ी, जिसमें उन्होंने कहा- ‘मुझ पर फेंके गए पत्थरों ने मुझे कष्ट नहीं दिया, क्योंकि इन पत्थरों को अज्ञानी लोगों ने फेंका था। लेकिन तुमने जो फूल मुझ पर फेंका, इससे मुझे गहरी तकलीफ हुई है, क्योंकि तुम तो ज्ञानी हो और फिर भी तुमने मुझ पर कोई चीज फेंकी।’

इस दुनिया में जिसने भी किसी तरह का आध्यात्मिक पागलपन दिखाया है, उसे हमेशा सताया गया है।[ad name=”HTML-2″]

उनकी एक कविता:

वियोग जन्म देता है बोध को
बोध- प्रेम के सच्चे मार्ग का बोध
प्रेम जो कुछ नहीं चाहता
जिसे नहीं है, जरूरत किसी की
अपने प्रियतम की भी नहीं,

क्योंकि यथार्थ की ऐसी हालत में
प्रेमी और प्रियतम नहीं होते हैं दो
अलग-अलग, नहीं कभी

दो हो जाते हैं एक।
एक साथ, सदा के लिए!

गौर फरमाइए, सूफियों का रहस्य है यही
मंसूर अल-हलाज कहते हैं
‘अनल हक’
देखो! एक सच्चा प्रेमी पूर्ण समर्पण कर विलीन हुआ
समा गया उस दिव्य प्रियतम के चरम प्रेम में

मैं वही हूं, जिसे मैं प्रेम करता हूं
और जिसे मैं प्रेम करता हूं, वह मैं हूं
हम दो आत्माएं हैं
जो एक ही शरीर में हैं
अगर तूने मेरे दर्शन कर लिए
समझ ले तूने उसके दर्शन कर लिए

– मंसूर

मौत की सजा मिलने से पहले अपने पुत्र को हलाज की आखिरी सीखः
‘पूरी दुनिया मानती है की नैतिक व्यवहार खुदा की ओर ले जाता है।’ हलाज कहते हैं, ‘लेकिन खुदा की कृपा पाने की कोशिश करो। अगर तुम्हें उसकी कृपा का एक कण भी मिल गया, तो वह देवताओं और इंसानों के तमाम भलाई के कामों से ज्यादा कीमती है।’

बीस साल तक हलाज एक ही फटा-चिथड़ा सूफी चोला पहने रहे। एक दिन उनके कुछ चेलों ने उनके उस चोले को जबरदस्ती उतारने की कोशिश की, ताकि उन्हें नए कपड़े पहना सकें। जब पुराने चोले को उतारा गया तो पता चला कि उसके भीतर एक बिच्छू ने अपना बिल बना लिया है। हलाज ने कहा, ‘यह बिच्छू मेरा दोस्त है, जो पिछले बीस साल से मेरे कपड़ों में रह रहा है।’ उन्होंने अपने चेलों से जिद की कि तुरंत उनके पुराने चोले और उस बिच्छू को, बिना नुकसान पहुंचाए, उन पर वापस डाल दें।

 

In this world who showed any kind of spiritual madness, it has always been persecuted. Mansour Al-Hlaj similar Sufi saint. Learn to live in certain aspects of their personality

Mansoor Al-Halaj Sufism was one of the most controversial personalities. He had claimed, “I am the Truth ‘which was deemed heretical and led him to the fifty-five-year-old was sentenced to death with great toughness. However, their true God-lover understood that you mean it, and he was respected by his bigger, and still do.
It was in those days when Mansour Baghdad. Junaid its Sufi master, he made several controversial question, but instead of answering Junaid said, “A time will come when you are on a piece of wood sticking red stain.”

He was pointing to the fact that on a day Mansoor will be hung on the gallows. The Mansour replied, ‘When this happens, your Sufi Chola must hold off the mask of a religious scholar. “This prophecy was true then when Mansoor’s death decree has been prepared and signed him to Junaid was asked. However Junaid did not want to sign, but the Caliph of Baghdad fought on that Junaid will be signed. Well, his Sufi Junaid Chola unloaded and turban and tunic to wear as a religious scholar of Islamic Academy arrived. There he signed the decree of death, saying that “we decide on Hlaj Mansour are just on the basis of external truth. As far as the inner truth is concerned, it is only God knows.

Junaid after meeting the high spiritual state in the next five years, he traveled to many parts of Central Asia and Iran. Scholars and ordinary people, both in their teachings and discourses and lavished praise on the uprising. Because of his blunt assay they Hlaj “became known as a master of the mysteries. They went on pilgrimage to Mecca in Basra, but it was stamped on them magicians. He then set out on a trip to India and China, where he was recognized as an enlightened guru.

He’s my second Haj to Mecca and stayed there two years. But sharing their spiritual learning came a major shift in the way. His teachings had been too esoteric and “I am the truth” by claiming they are a people that ‘truth’ side began to attract people who could not possibly understand. They spread many stories about the miracles. People of different opinions about them placed. It is said that ‘I am the truth’ because of the heretical claim they were driven out of fifty Islamic cities.

Haj pilgrimage to Mecca at second with about four thousand people were Hlaj. Throughout the years, barefoot and bareheaded in front of the Kaaba stood like that. Rose, a man is put in front of them some bread and a jug of water, but rarely does it happen that Hlaj touched them bread and water. The result is that the bone structure of his body was left over.

Baghdad to come back on the radical religious people accused of being sacrilegious and put them in jail for a year. Six months in prison beginning people constantly flocked to him for advice, but when the Caliph came to know the fact that he gave the order to Hlaj could not find any. The prison was closed Hlaj, there were three hundred prisoners.

One night Hlaj prisoners asked them would you want to be free from jail? Prisoners ‘yes’ when asked Hlaj an enigmatic pointed his finger. Suddenly all Hthkdian and locks were broken and the prison doors were opened. But many prisoners escape from prison were not Hlaj ran. Hlaj prisoners fleeing when asked about the reason of their not escape Hlaj replied, ‘my’ boss’ is proceeding with some secret which can be disclosed only on the gallows. My boss – I am a prisoner of God. ”

After the incident, was sentenced to death by the Caliph. It is said that a million people in Baghdad gathered to see her hanging. After hitting five hundred whip their limbs were hacked, gouged out his eyes and tongue was cut. Their mutilated bodies were left to suffer like that. At the time of their deaths. When the executioner cut off his head from his torso torrent of blood and sharp voice broke, “I am the truth. ‘Suddenly felt his body chopped one part screaming” I am the truth. “Then they impugn People started to feel that he is God killed a dearly loved.

Mansoor scriptures in India and came to teach those things which they knew. They just used to talk about these things. But when he arrived in Gujarat and Punjab, the meeting began with a few true spiritual enthusiasts, who was in a state of ecstasy to a different.
When he came back, wearing just a loincloth. The society they came from, what if a man wearing only a loincloth street swirling smoke appeared, it was considered gross crazy. The ultimate pleasure experience within Hlaj started to say, ‘I am not, I am not. “Then he began to sing dance like crazy on the streets.

When you are in a state of ultimate bliss of your personality structure which is hard, he turns loose. If fully baked clay pot in the kiln again become a mud pot. He then becomes soft and flexible.

You’d like him, a new look again, can give a new shape. Have you ever felt that the people are fun, they are very flexible and are unhappy when the same people are very strict, just like wood.

When the people saw that Mansur was the craze, he began making his distance, but he did not resist the more. But as soon as he said ‘I am God’ began to be charged on them all the way. He returned to Mecca. Everyone was orbiting the Kaaba. He wondered why there is such a crowd? Everyone here is why orbiting? He got out of there in a street setting was another stone. Perhaps he had that reputation in stone life. He saw both of them was the same energy. Then he said to them, “Kaba is too much crowd. All the same there is no need of a place to hang out. Some people can also visit the stone around. ”
It was just so much to say. Mansour punished severely for it. Their skins were busy, they were buried waist-deep in the ground and place ordered by the Caliph that whoever will pass the street, he would kill them stone. Stone died without them you can not go through that lane.

When he passed thence to a close friend, he was throwing something at them. His time did not dare to throw stones at them, he threw a flower. Mansur was a division of the mouth of only one poem, which he said “had stones thrown at me, I did not suffer because of these ignorant people threw stones. But you which flowers thrown at me, it hurt me deeply, because you’re so knowledgeable and yet you threw something at me. ”

Some kind of spiritual madness in this world who have shown, it has always been persecuted.

His poem:

Gives rise to a sense of disconnection
Bod- love the sense of the true path
Love which wants nothing
Which is not any need
None of his beloved,

Because in such a state of reality
Lover and beloved are not two
Individual, not ever

The two become one.
Together, Forever!

Consider chashma, what is the secret of the Sufis
Mansour Al-Hlaj says
‘Anal right’
Look! A true lover was dissolved complete surrender
Came upon the extreme love the Divine Lover

I am, who I’d love
And whom I’d love, is it I
We are two souls
Which are in the same body
If hast been my philosophy
Tune to understand his vision for the

– Mansur

Was convicted and sentenced to death before Halaj his son’s last lesson
“The whole world recognizes that ethical behavior leads to God.” Halaj says, “but try to get the grace of God. If you’ve got one iota of grace, that all the good deeds of gods and humans is more valuable. ”

Twenty years Hlaj are wearing the same tattered frock-snip Sufi. One day some of his disciples to his Chole forcibly tried to take off, so that they can wear new clothes. Chole was lowered to the old showed that his bill has made him a scorpion inside. Hlaj said, “The Scorpion’s my friend, who is living in the past twenty years of my clothes.” He insisted that his disciples immediately to their old Chole and scorpions, without damage, put them back on.

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